नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने शिक्षा के व्यावसायीकरण और आर्थिक रुप से गरीब वर्ग के बच्चों को निजी स्कूलों में शिक्षा से वंचित बाहर रखने का आरोप लगाने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली सरकार, सीबीएसई और एनसीईआरटी को नोटिस जारी किया है। चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय की अध्यक्षता वाली बेंच ने नोटिस जारी किया। यह याचिका दून स्कूल के डायरेक्टर जसमीत सिंह साहनी ने वकील सत्यम सिंह राजपूत के जरिये दायर की है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील अमित प्रसाद ने कहा कि निजी स्कूल अभिभावकों पर महंगी किताबें और शिक्षण सामग्री खरीदने के लिए दबाव बनाते हैं। महंगी किताबें और शिक्षण सामग्री से आर्थिक रुप से गरीब परिवार काफी प्रभावित होते हैं। याचिका में कहा गया है कि निजी स्कूल सीबीएसई के दिशा-निर्देशों का भी पालन नहीं करते हैं। सीबीएसई ने 2016 और 2017 में इस बात का सर्कुलर जारी किया था कि केवल एनसीईआरटी की पुस्तकों का ही इस्तेमाल किया जाए। लेकिन अधिकांश निजी स्कूल निजी प्रकाशकों की किताबों को ही तरजीह देते हैं। याचिका में कहा गया है कि निजी स्कूलों की ओर से महंगे शिक्षण सामग्री खरीदने के लिए दबाव बनाना शिक्षा के अधिकार खासकर धारा 12(1)(सी) का उल्लंघन है। शिक्षा के अधिकार कानून की धारा 12(1)(सी) के तहत वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है, लेकिन निजी स्कूल आर्थिक रुप से गरीब बच्चों को 10 से 12 हजार रुपये सालाना के खर्च के लिए मजबूर करते हैं, जबकि इसके लिए दिल्ली सरकार 5000 रुपये देती है। आर्थिक रुप से गरीब छात्रों के अभिभावकों के लिए इतने पैसे जुटाना मुश्किल होता है, इसलिए वे अपने बच्चों को स्कूलों से वापस कर लेते हैं।
याचिका में कहा गया है कि एनसीईआरटी की पुस्तकें 700 रुपये में मिल जाती हैं, लेकिन निजी प्रकाशकों की पुस्तकें 10 हजार रुपये से भी ज्यादा की आती हैं। याचिका में कहा गया है कि स्कूल बैग नीति के तहत स्कूल बैग का वजन छात्र के वजन का 10 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए, लेकिन इस नीति का भी पालन नहीं किया जाता है। इससे छात्रों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉
Join Now


