हजारीबाग/रामगढ़। राज्य में विधानसभा सत्र चल रहा है। कानून-व्यवस्था, राजस्व वृद्धि और अवैध गतिविधियों पर रोक जैसे मुद्दे सदन में गूंज रहे हैं। सरकार की ओर से सख्ती और पारदर्शिता के दावे किए जा रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से अलग तस्वीर पेश कर रही है। हजारीबाग में कोयले का अवैध कारोबार सत्र के दौरान भी बदस्तूर जारी है। स्थानीय सूत्रों का कहना है कि जिस समय सदन में अवैध खनन और तस्करी जैसे मुद्दों पर बहस हो रही है, उसी समय जिले के विभिन्न इलाकों से प्रतिदिन हजारों टन कोयला अवैध रूप से निकाला और बाहर भेजा जा रहा है।
सत्र की गंभीरता और जमीनी सच्चाई
विधानसभा सत्र को नीति-निर्माण और जवाबदेही का मंच माना जाता है। ऐसे समय में यदि अवैध कारोबार पर अंकुश न लगे, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। विपक्ष द्वारा पूर्व में अवैध खनन का मुद्दा उठाया जा चुका है, वहीं सरकार ने भी कार्रवाई के दावे किए हैं। इसके बावजूद हजारीबाग में कथित रूप से सक्रिय नेटवर्क पर प्रभावी रोक नहीं दिख रही।
संजय, संजीव और जितेंद्र की भूमिका पर चर्चा
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि इस अवैध कारोबार में संजय, संजीव और जितेंद्र नामक व्यक्तियों की अहम भूमिका है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्र में इन नामों को लेकर लगातार चर्चाएं हैं। यदि इन दावों में सच्चाई है तो सत्र के दौरान ही इस पर संज्ञान लिया जाना आवश्यक माना जा रहा है।
पुलिस संरक्षण के आरोप
सबसे गंभीर आरोप यह है कि यह कारोबार पुलिस के कथित संरक्षण में चल रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि ट्रक और ट्रेलर की आवाजाही खुलेआम होती है, लेकिन कार्रवाई सीमित दिखाई देती है। हालांकि संबंधित अधिकारियों की ओर से इस संबंध में कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है।
डेमोटांड का प्लांट और ‘अवैध’ कोयले की “खेवनहार”
डेमोटांड क्षेत्र में स्थित एक प्लांट को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि ‘अवैध’ कोयले की खेवन (स्टॉकिंग और प्रोसेसिंग) यहीं से की जा रही है। आशंका यह भी जताई जा रही है कि यहां से कागजी औपचारिकताओं के जरिए कोयले को वैध रूप देकर अन्य जिलों तक भेजा जाता है। यदि ऐसा है तो यह केवल स्थानीय स्तर का मामला नहीं, बल्कि बड़े नेटवर्क का संकेत हो सकता है।
रोजाना हजारों टन कोयले की चोरी
सूत्रों के अनुसार, प्रतिदिन हजारों टन कोयले की अवैध निकासी हो रही है। इससे सरकार को भारी राजस्व क्षति हो रही है। साथ ही, अनियंत्रित खनन से पर्यावरणीय असंतुलन, सड़क क्षति और स्थानीय आबादी पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
राजनीति और जनपद में सन्नाटा
चुनावी और राजनीतिक हलचलों के बीच इस मुद्दे पर जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी सवाल खड़े कर रही है। सत्र के दौरान जब सरकार और विपक्ष आमने-सामने हैं, तब इस तरह के गंभीर मामले पर व्यापक बहस की अपेक्षा की जा रही है।
सत्र में उठे मुद्दे का ज़मीनी असर कब?
सवाल यह है कि जब सत्र में कानून-व्यवस्था और अवैध गतिविधियों पर सख्ती की बात हो रही है, तो जमीनी स्तर पर उसका असर क्यों नहीं दिख रहा? क्या सत्र के दौरान इस मामले को प्राथमिकता मिलेगी? क्षेत्र के नागरिकों की मांग है कि मामले की उच्चस्तरीय, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो तथा दोषियों पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।


