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Home»झारखंड»घाटशिला उपचुनाव : भाजपा के लिए आसान नहीं रही यह सीट, एक ही बार खिला है कमल
झारखंड

घाटशिला उपचुनाव : भाजपा के लिए आसान नहीं रही यह सीट, एक ही बार खिला है कमल

डेस्क एडिटरBy डेस्क एडिटरSeptember 6, 20256 Mins Read
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घाटशिला। झारखंड में घाटशिला उपचुनाव को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है। एक ओर झारखंड मुक्ति मोर्चा और दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी है। घाटशिला विधानसभा सीट तत्कालीन स्वर्गीय मंत्री रामदास सोरेन के निधन के बाद से खाली हो गई है। ऐसे में 6 महीनों के भीतर यहां उपचुनाव होने वाला है। झामुमो संभवतः रामदास सोरेन के बड़े बेटे सोमेश सोरेन या उनकी पत्नी को चुनावी मैदान में उतार सकती है। वहीं भाजपा की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन अपने बेटे को दोबारा घाटशिला से लड़ाने के लिए और जीत हासिल करने के लिए जनता के बीच अपने बेटे बाबूलाल सोरेन संग घुल-मिल रहे हैं। बीते कुछ दिनों से वह और उनके बेटे लगातार घाटशिला विधानसभा क्षेत्र के दौरे पर हैं। चुनावी सरगर्मी के और बढ़ने के बाद आने वाले दिनों में इस सीट पर राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और पूर्व मुख्यमंत्री सह भाजपा नेता चंपाई सोरेन आमने सामने भी दिखेंगे।
झामुमो छोड़ भाजपा में जाने के बाद चंपाई सोरेन कोल्हान क्षेत्र में भाजपा के सबसे बड़े आदिवासी नेता हो गए। 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को उम्मीद थी कि चंपाई सोरेन कोल्हान में भाजपा को अच्छी-खासी सीट दिला सकते हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। परिणाम पूरा उल्टा हो गया। भाजपा कोल्हान से केवल 2 सीट निकाल पाई एक सरायकेला और एक जमशेदपुर पूर्वी। इसके अलावा कोई सीट भाजपा के खाते में नहीं आई। अब यह घाटशिला का उपचुनाव चंपाई सोरेन के लिए एक मौका और पार्टी में अपना अस्तित्व दिखाने की परीक्षा भी है। फिलहाल झामुमो और भाजपा की ओर से चुनाव कौन लड़ेगा यह अभी फाइनल नहीं है लेकिन भाजपा की ओर से बाबूलाल सोरेन के अलावा टिकट की रेस में कोई आगे दिख नहीं रहा। वहीं झामुमो रामदास सोरेन के परिवार से संभवतः उनके बेटे या उनकी पत्नी को चुनाव लड़ा सकती है। बात अगर झारखंड गठन के बाद के चुनावी परिणाम की की जाए तो भाजपा का गढ़ काफी कमजोर है। यहां भाजपा को केवल एक बार जीत मिली वह साल 2014 के चुनाव में। उस समय लक्ष्मण टुडू ने जीत हासिल की। लेकिन साल 2019 के चुनाव में भाजपा ने उन्हें दोबारा टिकट नहीं दिया। ऐसे में पिछले विधानसभा चुनाव में वह भाजपा छोड़ झामुमो में शामिल हो गए। ऐसे में घाटशिला में भाजपा का जीता हुआ एकलौता विधायक भी पार्टी में नहीं रहा। भाजपा घाटशिला में और कमजोर हो गई।2024 चुनाव में रामदास ने बाबूलाल को दी थी मात
साल 2024 के चुनाव की बात करें तो इस चुनाव में झामुमो के रामदास सोरेन और भाजपा के बाबूलाल सोरेन आमने-सामने थे। इसके अलावा चुनाव में JLKM की भी भूमिका थी। रामदास सोरेन को कुल 98,356 वोट मिले थे। वहीं बाबूलाल सोरेन को 75,910 वोट मिले थे। JLKM के रामदास मुर्मू को 8,092 वोट मिले थे। इस चुनाव में भाजपा की भारी हार हुई थी। रामदास सोरेन ने बाबूलाल सोरेन को कुल 22,446 वोटों के बड़े अंतर से हराया था।
2019 चुनाव में भी भाजपा को मिली थी हार
साल 2019 के चुनाव में भाजपा और आजसू ने अलग होकर लड़ा था। इस सीट में इसका भारी नुकसान दोनों पार्टियों को हुआ और इसका फायदा हो गया झामुमो को। झामुमो से रामदास सोरेन, भाजपा से लखन चंद्र मार्डी और आजसू से प्रदीप बालमुचू के बीच त्रिकोणीय मुकाबला हुआ। भाजपा के लिए ये नुकसान हुआ कि आजसू के वोटर उससे अलग हो गए। रामदास सोरेन को कुल 63,531 वोट मिले, लखन चंद्र मार्डी को 56,807 वोट मिले और आजसू से प्रदीप बालमुचू को कुल 31,910 वोट मिले थे। यह चुनाव रामदास सोरेन ने लखन चंद्र मार्डी को 6,724 वोट से हराया था। यह अंतर ज्यादा नहीं था। अगर भाजपा और आजसू साथ मिलकर चुनाव लड़ते तो आजसू के वोटरों का भाजपा को सपोर्ट मिलता। अगर मान लें कि प्रदीप बालमुचू को जितने वोट मिले उनमें से आधे लोगों ने उन्हें देखकर वोट दिया होगा क्योंकि वह उस क्षेत्र के कद्दावर नेता हैं और घाटशिला से साल 2000 और 2005 में चुनाव जीत चुके हैं। लेकिन अगर 15,000 आजसू वोट भाजपा को मिल जाते तो लखन चंद्र मार्डी का कुल वोट हो जाता 71,807। भाजपा की जीत ऐसे में वहां आसान हो जाती।2014 चुनाव में भाजपा ने गाड़ा था झंडा
झारखंड गठन के बाद घाटशिला विधानसभा चुनाव में पहली बार साल 2014 के चुनाव में भाजपा ने जीत हासिल की थी। इस चुनाव में भाजपा के लक्ष्मण टुडू ने जीत हासिल की थी। उन्हें कुल 52,506 वोट मिले थे। वहीं झामुमो से रामदास सोरेन को 46,103 वोट मिले थे और कांग्रेस से प्रदीप बालमुचू की बेटी सिंड्रेला बालमुचू को 36,672 वोट मिले थे। इस चुनाव में लक्ष्मण टुडू ने 6,403 वोटों से रामदास सोरेन को हराया था। यहां जो फैक्टर भाजपा के साथ साल 2019 में हुआ वही यहां झामुमो के साथ हुआ। झामुमो-कांग्रेस ने चुनाव अलग होकर लड़ा था। इस कारण झामुमो-कांग्रेस के वोट बंट गए थे। अगर दोनों दल साथ मिलकर चुनाव लड़ते और मान लें कि कांग्रेस के 10 हजार वोट भी झामुमो को मिलते तो यहां भाजपा जीत नहीं पाती।
2009 में पहली बार रामदास जीते थे चुनाव
इस बार के चुनाव में रामदास सोरेन पहली बार विधायक बने थे। झामुमो के टिकट पर उन्होंने चुनाव लड़ा था। लेकिन उनकी जीत का मार्जिन बहुत कम था। इस चुनाव में रामदास सोरेन को कुल 38,283 वोट मिले थे। वहीं कांग्रेस से प्रदीप बालमुचू को 37,091 वोट मिले थे और भाजपा से सूर्या सिंह बेसरा ने चुनाव लड़ा था और उन्हें कुल 28,561 वोट मिले थे। यह चुनाव रामदास सोरेन ने प्रदीप बालमुचू से महज 1,192 वोट से जीता था।2005 और 2000 में कांग्रेस ने जीता था चुनाव
पहले बात करते हैं साल 2005 के चुनाव की। इस बार का चुनाव झामुमो और कांग्रेस ने एक साथ लड़ा था। ऐसे में झामुमो से नाराज होकर रामदास सोरेन ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था। भाजपा से रामदास हांसदा ने और आजसू से कान्हू सामंत ने चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में प्रदीप बालमुचू को कुल 50,936 वोट मिले थे, स्वतंत्र उम्मीदवार रामदास सोरेन ने भी बढ़िया प्रदर्शन किया था। उन्हें कुल 34,489 वोट मिले थे, रामदास हांसदा को 21,352 वोट मिले थे और कान्हू सामंत को 15,187 वोट मिले थे। प्रदीप बालमुचू ने इस चुनाव में रामदास सोरेन को 16,447 वोटों से पराजित किया था।
वहीं अगर बात साल 2000 के चुनाव की करें तो इस चुनाव में कांग्रेस ने ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। प्रदीप कुमार बालमुचू को कुल 50,645 वोट मिले थे। वहीं भाजपा से बैजू मुर्मू को 18,769, भाकपा के बबलू मुर्मू को 16,353 और झामुमो के शंकर चंद्र हेम्ब्रम को 9,891 वोट मिले थे। इस चुनाव में प्रदीप बालमुचू ने बैजू मुर्मू को 31,876 वोटों के भारी अंतर से हराया था।
ये सारे आंकड़े समझने के बाद यह तो साफ है कि भाजपा के लिए घाटशिला से चुनाव जीतना आसान नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि शुरू से भाजपा का यहां समीकरण झामुमो और कांग्रेस के मुकाबले उतना ठीक नहीं है। प्रदीप कुमार बालमुचू की घाटशिला में अच्छी पकड़ है, वह कांग्रेस के बड़े कद के नेता हैं। इसके अलावा रामदास सोरेन के निधन के बाद उनके प्रति जनता में सहानुभूति है। झामुमो-कांग्रेस की सरकार है और ऐसे में भाजपा के लिए यह सीट जीतना आसान नहीं होगा।

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