Ranchi: महाधिवक्ता राजीव रंजन द्वारा लिखित पुस्तक ‘बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग देवघर’ (दिव्यता का स्पर्श) अब प्रकाशन के लिए तैयार है. पुस्तक अंग्रेजी भाषा में है, इस सावन के महीने में ही इसका लोकार्पण होना है. इसके एक महीने बाद हिंदी में भी यह पुस्तक लोगों की उपलब्ध करायी जायेगी. ऑथर के मुताबिक इस पुस्तक का लोकार्पण मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कर सकते हैं. राजीव रंजन ने इस पुस्तक को लेकर कई रोचक बातें न्यूज विंग के संवाददाता राणा प्रताप सिंह से साझा की है.
दैवीय शक्ति का हुआ अनुभव
राजीव रंजन ने बताया कि वर्ष 2000 के नवंबर माह में अपने भाई की शादी के बाद वे अपने चाचा के साथ पहली बार देवघर गए थे, संथाल परगना (गोड्डा) उनका ननिहाल है. देवघर बाबा बैद्यनाथ धाम की धरती पर पहुंचने पर उन्हें अलग तरह की अनुभूति हुई. उन्हें लगा कि यह शहर जाना पहचाना है. उसकी गलियां, पुराने घर, हर जगह उन्हें परिचित सा लगा. उन्हें ऐसा अनुभव हुआ कि पूर्व जन्म में वह इसी स्थान पर रहा करते थे. करीब 32 वर्ष की आयु में वह पहली बार देवघर गए थे, लेकिन यह शहर उन्हें अपना परिचित महसूस हो रहा था. ऐसा लगा कि कोई दैवीय शक्ति उन्हें देवघर बाबा मंदिर तक लेकर पहुंचा है.
साल में 50 बार जाते थे बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का दर्शन करने
पहली बार बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का दर्शन करने के बाद उन्हें काफी आनंद महसूस हुआ, इसके बाद से उनका जुड़ाव बाबा बैद्यनाथ से हो गया. इस दौरान वे साल में करीब 50 बार बाबा बैद्यनाथ के दर्शन करने को लेकर देवघर पहुंचने लगे. हर माह के शनिवार को वह जरूर बाबा के दर्शन करते थे. हालांकि बाद में काफी व्यस्तता के कारण उनका बाबा बैद्यनाथ के पास जाना थोड़ा काम हुआ था. लेकिन तब तक वह पूरी तरह बाबा बैद्यनाथ से जुड़ चुके थे.
5 वर्ष पूर्व से किया पुस्तक लेखन कार्य
राजीव ने बताया पिछले 5 वर्ष पूर्व उन्होंने महसूस किया कि बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग देवघर पर कई लोगों ने अपनी अलग-अलग व्याख्या दी है, लेकिन इस संबंध ना तो कोई दस्तावेज है और न ही इससे पुस्तक के रूप में किसी ने संकलित किया है. इसके बाद से उन्होंने बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग पर पुस्तक लिखनी शुरू की. इसी दौरान वे देवघर स्थित रिखिया आश्रम (स्वामी सत्यसंगानन्द सरस्वती आश्रम) गए जहां पीठाधीश्वरी स्वामी सत्संगी के सानिध्य में वे रहे थे, स्वामी सत्संगी इस पुस्तक के नाम पर अपनी सहमति दी, साथ ही उसमें दिव्यता का स्पर्श शब्द जोड़ने का भी सुझाव दिया, इसके बाद इस पुस्तक में दिव्यता का स्पर्श जोड़ा गया.
पुस्तक में सरदार पंडा प्रथा का भी जिक्र
राजीव रंजन ने बताया कि बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग पुस्तक में कुल 288 पन्ने हैं, जिसमें 6 चैप्टर है. दुर्लभ फोटोग्राफ्स के साथ-साथ कुछ कलरफुल फोटोग्राफ्स पुस्तक में है. पुस्तक में 1596 से चली आ रही सरदार पंडा प्रथा का जिक्र है. इस प्रथा को हटाने के लिए 1897 में वर्तमान कोर्ट में केस दायर हुआ था. जज योगेश चंद्र मित्तल ने 1901 में फैसला दिया था. बाबा मंदिर के संचालन के लिए योजना बनायी. सरदर पंडा कौन होगा. विवाद होने पर कैसे उसका समाधान होगा, इसे भी तय किया गया था. हाइकोर्ट का फैसला आने के बाद अब बाबा बैद्यानाथ मंदिर श्राइन बोर्ड बन गया. पुस्तक में कोर्ट के फैसलों को भी दर्शाया गया है. छठे व अंतिम चैप्टर में बाबा बैद्यनाथ को पूजा, पद्धति का जिक्र है. सुबह चार बजे और सावन में तीन बजे सुबह पूजा शुरू होती है. सरदार पंडा पूजा कराते हैं. कब-कब कौन-सी पूजा होती है, इसका पूरा वर्णन है.
लोगों की जिज्ञासा होगी दूर
राजीव ने बताया कि लोग आस्था एवं कामना पूर्ति को लेकर बाबा के दर्शन को जाते हैं. शिवलिंग पूजा का क्या महत्व है इसकी पौराणिकता क्या है, कब से यहां पूजा शुरू हुई है, इन सारी बातों की की जिज्ञासा लोगों में देखी गई है. यह पुस्तक लोगों की इन्हीं जिज्ञासाओं को दूर करेगा. ज्योतिर्लिंग एक ज्योति पुंज भी है. जिसके स्पर्श से हम सभी ब्रह्मांड की शक्ति से जुड़ते हैं, हमारे अंदर की चेतना को ब्रह्मांड की चेतना से जोड़ता है यही शिवलिंग की पूजा है.
मंदिर क्षेत्र में दी जाती है बलि
लेखक ने बताया कि बाबा बैद्यनाथ मंदिर क्षेत्र में प्रतिदिन बलि दी जाती है, यह बलि बकरा एवं काड़ा (बफेलो) की दी जाती है. इस दौरान भगवान शंकर के मंदिर को बंद कर दिया जाता है.
पुस्तक में है कई रोचक जानकारियां
राजीव ने बताया कि बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग देवघर के ऐतिहासिक, पौराणिकता आदि के बारे में इस पुस्तक में विस्तृत जानकारी दी गई है. बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग पर यह पहली पुस्तक है, जो जल्द लोगों के हाथ में होगा. उन्होंने ने बताया यहां शिवलिंग रावण का लाया हुआ है जो यहां स्थापित किया गया. इस क्षेत्र को चिता भूमि भी बोलते हैं. यहां माता सती का हृदय गिरा था, यह हृदय पीठ भी कहलाता है. शिवलिंग के पूजन से पहले यहां सती पूजा की प्रथा प्रचलित थी.


