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Home»झारखंड»रामगढ़»छठ पूजा पर विशेष: आस्था, इतिहास और परंपरा की विरासत, पढ़े पूरी खबर
रामगढ़

छठ पूजा पर विशेष: आस्था, इतिहास और परंपरा की विरासत, पढ़े पूरी खबर

खबरबोल एडिटरBy खबरबोल एडिटरOctober 25, 20253 Mins Read
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रामगढ़। रामगढ़ में छठ पूजा की परंपरा सैकड़ों वर्षों पुरानी मानी जाती है। बुजुर्ग बताते हैं कि ब्रिटिश काल में ही यहाँ के नदी घाटों पर छठ मनाने की शुरुआत हुई थी। पहले यह पर्व सिर्फ ग्रामीण परिवारों तक सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे यह शहर, कोयला क्षेत्रों और औद्योगिक बस्तियों तक फैल गया।

प्राचीन काल से ही सूर्योपासना से जुड़ा रहा है रामगढ़ की ऐतिहासिक जड़े

रामगढ़ क्षेत्र प्राचीन काल से ही सूर्योपासना से जुड़ा रहा है। सूर्य मंदिर तालाब, बड़ा तालाब कुजू, और दामोदर नदी घाट इस परंपरा के पुराने केंद्र हैं। स्थानीय इतिहासकार बताते हैं कि यहां पहले राजाओं और जमींदारों द्वारा सूर्य पूजा और स्नान अनुष्ठान कराया जाता था, जो धीरे-धीरे छठ महापर्व के रूप में विकसित हुआ।

नदी घाटों से शुरू हुआ सामाजिक उत्सव

करीब 80–100 वर्ष पहले, दामोदर नदी किनारे कुछ परिवारों ने पहली बार सामूहिक रूप से छठ व्रत रखा। तब से हर साल यहाँ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई।
आज यह पर्व पूरे जिले के हर गांव, हर मुहल्ले में श्रद्धा से मनाया जाता है।
रामगढ़ में छठ व्रत का सबसे बड़ा भावनात्मक पक्ष है। माँ, बहनें और बेटियाँ इस परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ा रही हैं। कई घरों में यह पर्व 3 या 4 पीढ़ियों से निरंतर मनाया जा रहा है।
व्रत की कठोरता, स्वच्छता और भक्ति इस क्षेत्र की छवि बन चुकी है।

आधुनिक समय में छठ पूजा ने ली नई पहचान

पिछले दो दशकों में छठ पूजा ने रामगढ़ में एक नया रूप लिया है। नगर परिषद और स्थानीय संगठन एलईडी लाइटों से सजे घाट, स्वच्छता अभियान, सुरक्षा व्यवस्था और मेडिकल टीम जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराते हैं। फिर भी लोग अब भी पारंपरिक मिट्टी के चूल्हे, बाँस की टोकरी और देसी गीतों से ही छठ की शुरुआत करते हैं।

लोकगीतों में बसता है इतिहास

“कांच ही बांस के बहंगिया…” और “उठू हे सूर्य देव” जैसे छठ गीत आज भी रामगढ़ की गलियों में गूंजते हैं। इन गीतों के माध्यम से पुरानी पीढ़ियों की आस्था और संघर्ष की कहानी आज भी जीवित है।

आस्था,अनुशासन, स्वच्छता और सामाजिक एकता का प्रतीक है यह पर्व

रामगढ़ में छठ पूजा की शुरुआत भले ही एक सदी पहले हुई हो, पर इसकी आत्मा हजारों साल पुरानी सूर्य उपासना से जुड़ी है। यह पर्व आज भी आस्था, अनुशासन, स्वच्छता और सामाजिक एकता का प्रतीक बना हुआ है। हर साल जब दामोदर के तट पर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, तो लगता है जैसे रामगढ़ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से फिर जुड़ रहा हो।

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