रांची। बुधवार सीएम एक्सीलेंस बालिका प्लस टू उवि बरियातू में 548 वां व हाई स्कूल बोडिया में 549 वां खुशी क्लास का आयोजन हुआ। लाइफ केयर हॉस्पिटल, रांची व खुशी क्लास के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित खुशी क्लास में बच्चों का उत्साह चरम पे रहा। सीएम एक्सीलेंस में कार्यक्रम की अध्यक्षता व संचालन प्रिंसिपल दीपक सिंह ने किया। बोडिया हाई स्कुल में प्रिंसिपल आनंद मिंज ने किया। सीएम एक्सीलेंस बालिका प्लस टू में 700 से अधिक छात्राओं ने जिस तरह हाथ उठाकर खुशी क्लास को अपना अभिभावक मान गर्मजोशी से स्वागत किया, दिल गदगद हो गया। मौके पर खुशी क्लास के संस्थापक सह संचालक मुकेश सिंह चौहान ने कहा कि तनाव, डिप्रेशन, हाईपरटेंशन, आत्महत्या की प्रवृत्ति को समाज से खदेड़ ही देनी है। सकारात्मक माहौल में घर के आंगन और स्वयं दिल में खुशी के दीप को जलाए रखना है। जिंदगी हमें जिंदादिली से जीने को मिली है। इसे हम तनाव-डिप्रेशन के हवाले तो कदापि नहीं करेंगे। सकारात्मकता आपके आत्मबल और हौसले को जबरदस्त रूप से बढ़ाता है। खुशी का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि हमेशा हंसते ही रहें। खुशी आपके आत्मशक्ति में छुपी है। किसी भी तरह के दर्द-पीड़ा, झंझवत का मुकाबला सकारात्मक भाव से करें। तनाव-निराशा खुद पर हावी न होने दें। खुशियों का स्वागत दिल खोल कर करें और मुश्किलों का सामना सकारात्मक भाव से करें। सही मायने में यही खुशी है। चौहान ने बच्चों से कहा कि छात्र अंक के कारण ही तनाव में आ जाते हैं। जबकि अंक आपके व्यक्तित्व, प्रतिभा की पहचान ही नहीं है। अंक एक सूचक मात्र है, वो बतलाता है कि अभी आप कहां खड़े हैं। अंक को चुनौती के रुप में जरुर लें, पर डर या तनाव के रूप में कभी भी नहीं। मौके पर चौहान ने सकारात्मकता को स्थापित करता एक कहानी भी सुनाई। अमित अच्छा फुटबॉल खेलता था। वो स्टेट की टीम में शामिल होना चाहता था। इसके लिए खूब मेहनत करता, फिर भी सलेक्ट नहीं हो पाता था। थककर अमित ने प्रैक्टिस छोड़ दिया। 3 सप्ताह तक जब अमित अभ्यास के लिए नहीं आया तब, उसका कोच घर आया और उससे अभ्यास छोड़ने का कारण पूछा। अमित निराश भाव से कहा, यह मुझसे नहीं हो पाएगा। कोच अमित को एक लोहार के दुकान में ले गया और कहा, सिर्फ ध्यान से देखो कि लोहार करता क्या है। अमित ने देखा, लोहार एक लोहे के टुकड़े को बड़े हथोड़े से पिटता है। लेकिन लोहा में कोई फर्क नहीं पड़ता। अब लोहार लोहे को आग की भट्टी में डाल देता है। जब लोहा तप कर लाल हो जाता है, तब बाहर निकाल कर उसे फिर हथोड़े से पिटता है। इस बार लोहा कुछ आकार लेता है। लोहार लोहे को फिर गर्म करता है, पिटता है। ऐसा वो कई बार करता है। आखिरकार लोहार उस लोहे को सुंदर कलश का रूप दे देता है। अब कोच अमित से कहता है, लोहार जब लोहे को कूट रहा था, तब शुरुआती दौर में लोहे पर कुछ भी असर नहीं हो रहा था। यानी लोहार का हर प्रहार असफल हो रहा था। ऐसे में लोहार अपनी असफलता पर वहीं रुक क्यों नहीं गया ? अमित कहता है, यह असफलता थोड़े ही थी, कलश बनाने की शुरुआती प्रक्रिया थी। अगर लोहार रुक जाता तो इतना सुंदर कलश कैसे बनता। कोच मुस्कुरा कर बोला, फिर तुम अपनी शुरुआती प्रक्रिया को कैसे रोक दिये ? अमित को झटका लगा, वो तुरंत कोच का हाथ पकड़ा और अभ्यास के लिए मैदान में पहुंच गया। सब कुछ भूलकर नए सिरे से अभ्यास शुरू कर दिया। परिणाम यह, अगले सीजन में स्टेट टीम के लिए चुन लिया गया।
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