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Home»#Trending»बाबा पंचतत्व में विलीन: अंतिम विदाई में आसमान भी रोया,बाबा का अंतिम दर्शन करने पगडंडी से पहुंचे लोग, पढ़े खबर
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बाबा पंचतत्व में विलीन: अंतिम विदाई में आसमान भी रोया,बाबा का अंतिम दर्शन करने पगडंडी से पहुंचे लोग, पढ़े खबर

खबरबोल एडिटरBy खबरबोल एडिटरAugust 6, 20255 Mins Read
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प्रकृति की गोद में समा गए दिशोम गुरु शिबू सोरेन, बेटे हेमंत सोरेन ने दी मुखाग्नि

जिस सरजमीं से शुरू किया संघर्ष, वहीं पंचतत्व में हुए विलीन

रामगढ़। दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने हमेशा प्रकृति के बीच रहकर राजनीति की और आज प्रकृति में ही समा गए । मुख्यमंत्री और उनके बेटे हेमंत सोरेन ने उन्हें मुखाग्नि दी और अंतिम जोहार कहा। अंतिम संस्कार के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बेहद भावुक हो गए और उनकी आंखें डबडबा गई। बेहद भारी मन से उन्होंने अपने पिता और राजनीतिक गुरु दोनों को इस दुनिया से विदा किया। अंतिम संस्कार के दौरान उनके साथ भाई बसंत सोरेन और उनके परिवार के कई सदस्य वहां मौजूद थे।
घाट पर एक ही चर्चा थी कि जिस सरजमीं से शिबू सोरेन ने संघर्ष और राजनीति शुरू की। आज उसी जगह पर पंचतत्व में विलीन हुए। सैकड़ो गांवों से पहुंचे लोग अपने बाबा और नेता को प्रणाम कर उन्हें अंतिम विदाई दी।

घाट पर शव पहुंचते ही रो पड़ा आसमान

पैतृक गांव नेमरा घाट पर जैसे ही शव लेकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पहुंचे, आसमान भी रो पड़ा। झारखंड की अस्मिता की लड़ाई लड़ने वाले लाल को प्रकृति ने भी अंतिम विदाई दी। श्मशान घाट पर जैसे ही शिबू सोरेन का पार्थिव शरीर रखा गया झमाझम बारिश शुरू हो गई। ऐसा लगा अपने इस लाल के निधन पर आसमान भी रो रहा है।

धान के खेत में बनाया गया बाबा के लिए रास्ता

दिशोम गुरु शिबू सोरेन का अंतिम संस्कार गांव के ही बड़की नाला तट पर हुआ। घर से लगभग 600 मीटर की दूरी पर स्थित श्मशान घाट में जाने के लिए रास्ते भी बनाए गए थे। कई खेतों में फसल को हटाकर नेमरा के लोगों ने रास्ता बनाया, ताकि बाबा को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जा सके।

सूरज की तरह चमकने वाले महान योद्धा के दर्शन के लिए उमड़ी भीड़

रामगढ़ जिले में दिशोम गुरु शिबू सोरेन की शव यात्रा काफी लंबी रही। जैसे ही रामगढ़ जिले में शव वाहन प्रवेश किया, लोग उनके दर्शन के लिए पीछे-पीछे भागने लगे। मुख्यमंत्री का भावुक चेहरा देख हर किसी का कलेजा फट गया। जिस पिता के साए में हेमंत सोरेन ने ना सिर्फ राजनीती सीखी, बल्कि झारखंड को एक अलग पायदान पर लेकर गए। आज हेमंत सोरेन के सर से पिता का साया उठा, तो रामगढ़ जिलावासी भी खुद को अनाथ ही समझने लगे। जिलावासी शिबू सोरेन को अपने पिता समान ही मानते थे।

6 दशकों में जिला वासियों ने देखा था शिबू सोरेन का कई रूप

पिछले 6 दशकों से शिबू सोरेन का अलग-अलग रूप रामगढ़ जिला के वासियों ने देखा है। सबसे बड़ी बात सुदूरवर्ती गांव नेमरा से निकलकर झारखंड की राजनीति को अलग पहचान दिलाने वाले शिबू सोरेन सबके दिलों में बहुत जल्दी ही जगह बना चुके थे। गांव में रहने वाले आदिवासियों के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया। सबसे पहले तो उन्होंने महाजनी व्यवस्था का पुरजोर विरोध किया था। जिसका फायदा सीधे-सीधे मासूम ग्रामीण को हुआ। इसके बाद उन्होंने झारखंड के लोगों की दिशा और दशा बदलने के लिए राज्य से लेकर केंद्र तक की व्यवस्था सुदृढ़ की।

सूरज की तरह झारखंड में चमकते थे शिबू सोरेन

शिबू सोरेन के अंतिम संस्कार में पहुंचे नेताओं ने कहा कि झारखंड की फिज़ा में शिबू सोरेन सूरज की तरह चमकते थे। अथक संघर्ष और तप से उन्होंने अपनी यह जगह बनाई थी। उस महान योद्धा के अंतिम झलक को देखने के लिए लगभग 45 किलोमीटर तक लोग सड़कों पर खड़े रहे। लोग दोनों तरफ से पुष्प वर्षा करते नजर आए। जिस रास्ते से भी शिबू सोरेन का शव वाहन गुजरा वहां लोग हाथ जोड़कर खड़े नजर आए।

रास्ते पर नहीं थी जगह, पगडंडियों से शमशान घाट पहुंचे समर्थक

दिशोम गुरु शिबू सोरेन का अंतिम संस्कार रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड अंतर्गत उनके पैतृक गांव नेमरा में होना था। इसकी खबर जब लोगों को लगी, वह मंगलवार की सुबह से ही नेमरा पहुंचने लगे थे। गांव से लगभग 7 किलोमीटर पहले लुकैयाटांड़ में ही जिला प्रशासन ने बैरीकेडिंग कर दिया था। वीआईपी लोगों के लिए हेलीपैड और गाड़ियों की व्यवस्था की गई थी। 7 किलोमीटर तक का रास्ता वीआईपी जिला प्रशासन द्वारा बनाए गए रूट के हिसाब से ही तय कर पा रहे थे। लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा और शिबू सोरेन के समर्थकों ने 7 किलोमीटर की लंबी दूरी को पैदल ही पार करना स्वीकार किया।

रास्ते पर नहीं थी चलने की जगह

आम लोग लुकैयाटांड़ से पैदल चलकर नेमरा पहुंचे। वहां भी रास्ते पर चलने की जगह नहीं थी। जिला प्रशासन द्वारा जिस रास्ते की मरम्मत शमशान घाट तक जाने के लिए की गई थी, वह भी कीचड़ से भरा था। धान के खेत और कीचड़ में पटरी रखकर शव को ले जाने की व्यवस्था हुई थी। आम नागरिक को जब वहां रास्ता नहीं मिला तो वे खेतों के पगडंडियों पर उतर आए। श्मशान घाट के चारों तरफ अलग-अलग पगडंडियों से होकर शिबू सोरेन के समर्थक वहां पहुंचे। सबसे बड़ी बात यह थी कि जब वहां बारिश शुरू हुई, तो कुछ लोग वहां बने टेंट में छुपने लगे।लेकिन शिबू सोरेन के समर्थकों ने इस विषम परिस्थिति में भी खुद को टिकाए रखा। लगभग आधे घंटे तक होने वाली बारिश में वह खड़े रहे और अंततः अपने नेता को श्रद्धांजलि अर्पित कर ही वापस लौटे।

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