रामगढ़। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पुत्र धर्म की पराकाष्ठा का उदाहरण पेश किया है। गुरुजी के निधन के बाद उन्होंने यह तय किया कि जिस मिट्टी में उनके पिता ने जन्म लिया था, इस प्रकृति के बीच उन्हें अंतिम जोहर कहा जाए। 5 अगस्त को उनका अंतिम संस्कार हुआ। इसके बाद पुत्र धर्म निभाने के लिए हेमंत सोरेन ने उन सारी विधियों को पूरा किया, जिसे उनके पूर्वज करते आ रहे थे। इन सब के साथ उन्होंने राजधर्म की बागडोर भी नहीं छोड़ी। आम नागरिकों का काम भी वैसे ही जारी रखा, जैसे पहले चल रहा था। इसके अलावा उनके पैतृक गांव नेमरा में पहुंचने वाले अतिथियों की सुविधा का ध्यान भी बखूबी रखा गया । दशकर्म और संस्कार भोज में शामिल होने वाले लोगों के लिए बेहतर इंतजाम कर हेमंत सोरेन पुत्र धर्म पर खरे उतर गए।
आदिवासी समाज ने गुरु जी को कहा अंतिम जोहार
संस्कार भोज में आदिवासी समाज के लाखों लोग जुटे। सभी लोगों ने दिशोम गुरु शिबू सोरेन के साथ बिताए गए पलों को याद किया। कुछ तो ऐसे लोग भी थे जिन्होंने आंदोलन में गुरु जी का साथ दिया था। कई ऐसे समाज के लोग थे जिन्होंने संघर्ष के दिनों में गुरु जी को पनाह दी थी। हर व्यक्ति वहां पहुंचकर उन बीते पलों को याद कर गुरु जी को अंतिम जोहार कह रहा था।


